हाथों में लेकर पासपोर्ट
बस यूँ ही सोच में डूब गया
कुछ छूट गया कुछ छूटेगा
कुछ क्या सब कुछ छूटेगा
टूटा दिल फिर टूटेगा
देह–सांस की डोरी हो
या घर–गाँव की खोरी हो
ममता का बंधन हो
या आँखों का क्रंदन हो
यही नियति जग–जीवन की
हम बीतेंगे, ढल जाएंगे
चलते–चलते हर पंथी
अपने ठिकाने चल जाएंगे
फिर से नव अंकुर फूटेगा
फिर उससे भी सब छूटेगा
– अतुल मौर्य
25/05/2026