Wednesday, June 17, 2026

पासपोर्ट

हाथों में लेकर पासपोर्ट

बस यूँ ही सोच में डूब गया

कुछ छूट गया कुछ छूटेगा

कुछ क्या सब कुछ छूटेगा

टूटा दिल फिर टूटेगा

देह–सांस की डोरी हो

या घर–गाँव की खोरी हो

ममता का बंधन हो

या आँखों का क्रंदन हो

यही नियति जग–जीवन की

हम बीतेंगे, ढल जाएंगे

चलते–चलते हर पंथी

अपने ठिकाने चल जाएंगे

फिर से नव अंकुर फूटेगा

फिर उससे भी सब छूटेगा

– अतुल मौर्य

25/05/2026

ग़ज़ल

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