Sunday, January 4, 2026

फिर से मिलने लगा हूं किसी से बहुत

अधूरा गीत-1 


फिर से मिलने लगा हूं किसी से बहुत

फिर से दिल ये धड़कने की कोशिश में है

फिर से चेहरा कोई चांद बनने लगा

फिर कली कोई खिलने की कोशिश में है

ये सभी कोशिशें हैं तो प्यारी बहुत, धारदारी बहुत

फिर से इन धारियों पे ही चलने लगा हूं

दिल मचलने लगा है मैं डरने लगा हूं

मैं डरने लगा हूं


आगमन फिर से श्रृंगार का है हुआ

आचमन मन के हर द्वार का है हुआ

छिन गया जो भी भाया है मन को मेरे

दे गया अश्रु सागर नयन को मेरे

तुम भी भाने लगे हो यही सोचकर

दिल बिखरने लगा मैं सिहरने लगा हूं

मैं डरने लगा हूं

- अतुल मौर्य

Sunday, December 28, 2025

गज़ल-

 गज़ल-

1222/  1222/  1222/  1222

मेरा मजबूर हो जाना तुम्हारा दूर हो जाना

हमारे आईना-ए-दिल का चकनाचूर हो जाना

 

इधर इक तीर का सीने को खूँ से तर-ब-तर करना

निशाने पर खुदी के उनका और मगरूर हो जाना

 

मिरा कहना हलो जी कौन फिर उस फोन के पीछे

हसीं इक चाँद से मुखड़े का वो बे-नूर हो जाना

 

अना को छोड़ कर रिश्ता बचाने जब वो आ जाए

अतुल घुटने पे आ के तुम उसे मंजूर हो जाना


- अतुल मौर्य


غزل

بحر: 1222/ 1222/ 1222/ 1222

میرا مجبور ہو جانا تمہارا دور ہو جانا
ہمارے آئینۂ دل کا چکناچور ہو جانا

ادھر اک تیر کا سینے کو خوں سے تر بہ تر کرنا
نشانے پر خودی کے ان کا اور مغرور ہو جانا

میرا کہنا ہیلو جی کون پھر اس فون کے پیچھے
حسیں اک چاند سے مکھڑے کا وہ بے نور ہو جانا

انا کو چھوڑ کر رشتہ بچانے جب وہ آ جائے
اتل گھٹنے پہ آ کے تم اسے منظور ہو جانا

— اتل موریہ

Friday, December 26, 2025

तुम्हारे बाद का आलम है ये

तुम्हारे बाद का आलम है ये

मेरी आंखों पे दरियाओं का कब्जा रहता है

मेरे गालों पे गम धंस गए हैं, 

मेरे चेहरे की रंगत खो गई है

एक सूरत जो खूबसूरत है बहुत

मुझे मानूस सी लगने लगी है

दुनिया से दुनिया घट गई है

मुझी से कट गया हूं मैं

हथेली देखता हूं जब भी अपनी

मुझे छाले दिखाई देते हैं

आईना हँसने लगा है मुझ पर

दीवारें चीखती चिल्लाती हैं 

इंस्टाग्राम पे जिसे देखती होगी तुम

मेरा बदला हुआ सा रूप है वो

मुझे उससे भी नफरत हो गई है

लम्हात जो खुशबुओं से थे

बिताए साथ में हमने जो थे

उन्हीं से बू आने लग गई है

दोस्ती की मिसाल थी तुम

तुम्ही पर तो गुरूर था मुझको

वहीं छिन गया हो जैसे

कारोबार लुट गया हो मेरा

पांव मयखाने की ओर मुड़ने लग गए हैं

धुंए से चेहरा बनाने लग गया हूं

कलाकारी तो इतनी बढ़ गई है

ग़ज़लें भी सजाने लग गया हूं

मरते दम का आलम क्या होता है

तज़ुर्बा जीते जी होने लगा है 

तुम्हारे बाद का आलम है ये

तुम्हारे बाद का आलम है ये

- अतुल मौर्य

Tuesday, November 25, 2025

मेरी आँखों में समन्दर के सिवा कुछ भी नहीं है

 

22-22-22-22-22-22-2

 

मेरी आँखों में समन्दर के सिवा कुछ भी नहीं है

और उसको देख के लगता है हुआ कुछ भी नहीं है

 

चाराग़र देख के कहते हैं मुझे तेरी कमी है

तू आ कर देख ले तो फिर ये दवा कुछ भी नहीं है

 

जब से पापा हुए और हुईं माँ मेरी रुख्सत

दीवारो छत के सिवा घर में बचा कुछ भी नहीं है

 

 तुम जैसे तो पहले भी कई तूफां हैं देखे

दिल-ए-जुर्रत है वो ही इसको हुआ कुछ भी नहीं है

 

मेरी हालत पे न जाओ मुझसे मिलाओ आँखें

इनमें देखो औ कहो तुमने किया कुछ भी नहीं है

 

तेरी हर चाल तिलिस्म-ए- जीस्त समझने लगा हूँ

तुझको लगता है ‘अतुल’ को तो पता कुछ भी नहीं है

 

-    अतुल मौर्य

 

तारीख- 25/11/2025

 

 

 

 

 

 

Monday, January 24, 2022

क्या तुमको मेरी याद नहीं आती

 अच्छा ...तुमको मेरी याद नहीं आती?

तो मत आये; पर ये तो बताओ

क्या तुम्हारे शहर में सूरज नहीं उगता

या वहाँ रात नहीं होती

क्या तुम्हें आसमाँ में बादल नहीं दिखते

या उनसे बरसात नहीं होती

ठीक है ...तुमको मेरी याद नहीं आती

पर ये तो बताओ कि

क्या तुम्हारे शहर में फ़ूल नहीं खिलते

या उनपे भँवरे नहीं मंडराते

क्या तुम्हारे आसपास पेड़ नहीं 

या उनपे कभी पंक्षी गीत नहीं गाते

.....

क्या तुम्हारे शहर में हवा भी नहीं चलती

या वो तुमको छूती नहीं 

या तुम अब अपनी जुल्फें नहीं लहराती

हाँ ..हाँ.. बताओ

बताओ ..कि क्या तुम अब कभी दिया नहीं जलाती

या उनकी लौ से रौशनी नहीं आती

.....

चलो माना कि तुम्हारे शहर में पर्वत नहीं , समंदर नहीं

मगर सड़कों पे घास तो है

क्या उनपे ओस की बूँदें नहीं हैं

ठीक है ...गर ये प्रेमिल  एहसास नहीं तो न ही सही

अब मैं तुम्हें याद नहीं ...तो .....न ही सही..।।


Sunday, December 5, 2021

तज़ुर्बा ज़िन्दगी का ये मेरा कहता है जानेमन

 


1222- 1222 -1222- 1222

ग़ज़ल-

तज़ुर्बा ज़िन्दगी का ये मेरा कहता है जानेमन

वही रोता बहुत है जो बहुत हँसता है जानेमन /1/


ख़ुदा कैसे दिखे उनको दिलों में जिनके नफ़रत है

मुहब्बत की नज़र देखो ख़ुदा दिखता है जानेमन /2/


ये चंदा और सूरज और जमीनों आसमां सारे

सभी का रूप तेरे रूप से मिलता है जानेमन /3/


ये दुनिया इक बगीचा है बगीचे में ये देखा मैं

सभी फूलों का हर भँवरे से कुछ रिश्ता है जानेमन /4/


अभी मशरूफ हूँ थोड़ा मैं करियर को बनाने में

तुझे पाने की ख़ातिर बस यही रस्ता है जानेमन /5/


कभी खुलकर नहीं कहता तू गज़लों के बहाने सुन

तेरी सादामिज़ाजी पे 'अतुल' मरता है जानेमन /6/


– अतुल मौर्य

06/12/2021


Sunday, July 18, 2021

ग़ज़ल- हम हैं तन्हा तन्हाई में जीते हैं

 

22 - 22 - 22 - 22 - 22 - 2

हम हैं तन्हा तन्हाई में जीते हैं
मोहब्ब्त की सच्चाई में जीते हैं  /१/

आँखें उसकी पैमाने की सूरत हैं
पैमाने की गहराई में जीते हैं  /२/

हम जैसे बंजारे बेघर इंशा हैं जो
वो सब रब की परछाई में जीते हैं /३/

लोगों ने बस घायल करना सीखा है
हम घावों की तुरपाई में जीते हैं /४/

मरते हैं रोजाना खुद में दीवाने
मर मर कर वो हिजराई में जीते हैं /५/

हम हैं थोड़े आवाँरे औ शायर भी
सो गज़लों की गोयाई में जीते हैं /६/

~अतुल मौर्य

ग़ज़ल

ग़ज़ल-6 भरो हुंकार ऐसी

 1222-1222-1222-1222 भरो हुंकार ऐसी, दिल्ली का दरबार हिल जाए युवाओं कर दो कुछ ऐसा  कि ये सरकार हिल जाए /१/ यहाँ जो बाँटते हैं मजहबों के नाम ...