Friday, December 26, 2025

तुम्हारे बाद का आलम है ये

तुम्हारे बाद का आलम है ये

मेरी आंखों पे दरियाओं का कब्जा रहता है

मेरे गालों पे गम धंस गए हैं, 

मेरे चेहरे की रंगत खो गई है

एक सूरत जो खूबसूरत है बहुत

मुझे मानूस सी लगने लगी है

दुनिया से दुनिया घट गई है

मुझी से कट गया हूं मैं

हथेली देखता हूं जब भी अपनी

मुझे छाले दिखाई देते हैं

आईना हँसने लगा है मुझ पर

दीवारें चीखती चिल्लाती हैं 

इंस्टाग्राम पे जिसे देखती होगी तुम

मेरा बदला हुआ सा रूप है वो

मुझे उससे भी नफरत हो गई है

लम्हात जो खुशबुओं से थे

बिताए साथ में हमने जो थे

उन्हीं से बू आने लग गई है

दोस्ती की मिसाल थी तुम

तुम्ही पर तो गुरूर था मुझको

वहीं छिन गया हो जैसे

कारोबार लुट गया हो मेरा

पांव मयखाने की ओर मुड़ने लग गए हैं

धुंए से चेहरा बनाने लग गया हूं

कलाकारी तो इतनी बढ़ गई है

ग़ज़लें भी सजाने लग गया हूं

मरते दम का आलम क्या होता है

तज़ुर्बा जीते जी होने लगा है 

तुम्हारे बाद का आलम है ये

तुम्हारे बाद का आलम है ये

- अतुल मौर्य

No comments:

Post a Comment

ग़ज़ल

ग़ज़ल-6 भरो हुंकार ऐसी

 1222-1222-1222-1222 भरो हुंकार ऐसी, दिल्ली का दरबार हिल जाए युवाओं कर दो कुछ ऐसा  कि ये सरकार हिल जाए /१/ यहाँ जो बाँटते हैं मजहबों के नाम ...