मन के बाहर का वातावरण सो रहा
मन के भीतर है जो ,रो रहा-रो रहा
गर्जना मन की मन में ही चलती रही
आँख मलते रहे रात ढलती रही
यादों के जाने कितने किले ढह गए
और मलबे में हम थे दबे रह गए
अश्कों से थी भरी आँख प्यासी रही
और चेहरे पे कोई उदासी रही
चल पड़ा हूँ तुम्हे ढूंढ़ने स्वर्ग तक
मेरी दुनिया तुम्ही से तो है तुम तलक
ये मुझे है ख़बर और तुम्हें भी पता
ना ही मैं हूँ ग़लत ना तेरी कुछ ख़ता
बात हमने किया जब-जब भी कभी
जल उठे सारे किस्मत के पन्ने सभी
राह तक लूंगा मैं उम्र के छोर तक
आखिरी सांस की आखिरी डोर तक
आखिरी सांस की आखिरी डोर तक
रात का ये अंतिम पहर खो रहा
ले के पलकों पे मैं बोझ हूँ ढो रहा
मन के बाहर का बातावरण सो रहा
मन के भीतर है जो , रो रहा-रो रहा
रो रहा ... रो रहा...
"मैं लिखता हूँ ताकि एहसास जिंदा रहें" (I write so that feelings stay alive). I am Atul, and this blog is my canvas. Through my poetry and ghazals, I try to capture the beauty of the Hindi and Urdu languages and the depth of the human heart. Thank you for being a part of my literary journey.
Wednesday, January 20, 2021
रात के आँसू
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ग़ज़ल
ग़ज़ल-6 भरो हुंकार ऐसी
1222-1222-1222-1222 भरो हुंकार ऐसी, दिल्ली का दरबार हिल जाए युवाओं कर दो कुछ ऐसा कि ये सरकार हिल जाए /१/ यहाँ जो बाँटते हैं मजहबों के नाम ...
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22-22-22-22-22-22-2 मेरी आँखों में समन्दर के सिवा कुछ भी नहीं है और उसको देख के लगता है हुआ कुछ भी नहीं है चाराग़र देख के कहते हैं मुझ...
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बहरे हज़ज़ मुसम्मन सालिम 1222 - 1222 - 1222 - 1222 हज़ारों ज़ख्म खाकर भी यहां पर मुस्कुराना है हमें काटों में रहकर भी सदा ख़ुशबू लुटाना है अलग...
👌👌
ReplyDeleteधन्यवाद आप का
Delete👌👌❤❤
ReplyDeleteधन्यवाद आलोक 🙏
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