मैं अक्सर सोचता हूँ
जब वो बस या रेल की खिड़की से
लहकते धान के खेतों को देखती होगी,
तो उसे कौन याद आता होगा?
जब हवा उसके चेहरे को छूकर
ज़ुल्फ़ों से उलझती होगी,
तो उसे कौन याद आता होगा?
किसी फ़िल्म या प्रेम-उपन्यास के
उस नाज़ुक से मोड़ पर,
जहाँ पर दिल पिघलता है, आँखें भर आती हैं,
वो उस दृश्य में किसको देखती होगी?
जब सर्दियाँ उतरती हैं, दिसंबर पास आता है,
या सावन की पहली बारिश गिरती है,
तो क्या किसी का ख़याल उसे छूता भी है?
वो जब कैनवस पर रंग बिखेरती होगी,
या किसी ख़ास मौक़े पर मेहंदी रचाती होगी,
तो क्या कभी अनजाने में भी लिख देती होगी—
मेरे नाम का पहला अक्षर?
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