Wednesday, October 28, 2026

हुआ क्या है मुझको ये कुछ दिनों से

 हुआ क्या है मुझको ये कुछ दिनों से


की पहले से कितना मैं बदला हुआ हूं

ये किसके तसव्वुर में खोया हुआ हूं

मेरे जागने से ज़रा ठीक पहले

कौन है जो जग जाता है मुझमें पहले

वो सुब्ह की पहली किरन बन के आए

मन–उपवन में हिरन बन के आए


हुआ क्या है मुझको ये कुछ दिनों से


की रातों में नींद आने से पहले

आँखें समंदर सी हो जाती क्यूं हैं

कोई इसमें आए गोता लगाए

तूफां सा आए और ज्वार लाए

माथे की नस जब तलक दुख न जाए

कमबख़्त मुझको न नींद आए


हुआ क्या है मुझको ये कुछ दिनों से


की खोये हुए मुझको सोए हुए ही

हाय दोपहर के दो बज गए हैं

की माँ कह रही है नहा ले तू खा ले

उसे सुन के मैं अनसुना कर दिया हूं

समय रुक गया है या मैं रुक गया हूं

ये ख़ुद के ही संग मैं क्या कर लिया हूं


हुआ क्या है मुझको ये कुछ दिनों से


ये कौन है जो रहता है पहलू में मेरे

मैं सोऊं तो सर पे वो उँगली फिराए

मैं  जागूं तो देखूं कि वो जाग जाए

मेरे बाजुओं को वो तकिया बनाए

हौले से कानों में आ कर के बोले

हो कितने प्यारे तुम हो कितने भोले


हुआ क्या है मुझको ये कुछ दिनों से


कौन है करूँ जिससे बातें मैं सारी

लगे मुझको जिसकी हर बात प्यारी

वो रोए तो उँगली से आंसू हटा दूं

हँसे तो मैं उसके संग मुस्कुरा लूं

लगा लूं गले जब हो जी उसका भारी

वो बन गया है मेरी दुनिया सारी


हुआ क्या है मुझको ये कुछ दिनों से


मैं सोचूं की हम हैं किनारे नदी के

नदी जो कि अपनी रवानी में बहती

रवानी एहसास दरमियां का हमारे

दरमियां हमारे ये वो हरदम रहेगा

मगर इक किनारा नदी का जो मैं हूं

दूजे किनारे से ना मिल सकेगा

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