Monday, January 24, 2022

क्या तुमको मेरी याद नहीं आती

 अच्छा ...तुमको मेरी याद नहीं आती?

तो मत आये; पर ये तो बताओ

क्या तुम्हारे शहर में सूरज नहीं उगता

या वहाँ रात नहीं होती

क्या तुम्हें आसमाँ में बादल नहीं दिखते

या उनसे बरसात नहीं होती

ठीक है ...तुमको मेरी याद नहीं आती

पर ये तो बताओ कि

क्या तुम्हारे शहर में फ़ूल नहीं खिलते

या उनपे भँवरे नहीं मंडराते

क्या तुम्हारे आसपास पेड़ नहीं 

या उनपे कभी पंक्षी गीत नहीं गाते

.....

क्या तुम्हारे शहर में हवा भी नहीं चलती

या वो तुमको छूती नहीं 

या तुम अब अपनी जुल्फें नहीं लहराती

हाँ ..हाँ.. बताओ

बताओ ..कि क्या तुम अब कभी दिया नहीं जलाती

या उनकी लौ से रौशनी नहीं आती

.....

चलो माना कि तुम्हारे शहर में पर्वत नहीं , समंदर नहीं

मगर सड़कों पे घास तो है

क्या उनपे ओस की बूँदें नहीं हैं

ठीक है ...गर ये प्रेमिल  एहसास नहीं तो न ही सही

अब मैं तुम्हें याद नहीं ...तो .....न ही सही..।।


Sunday, December 5, 2021

तज़ुर्बा ज़िन्दगी का ये मेरा कहता है जानेमन

 


1222- 1222 -1222- 1222

ग़ज़ल-

तज़ुर्बा ज़िन्दगी का ये मेरा कहता है जानेमन

वही रोता बहुत है जो बहुत हँसता है जानेमन /1/


ख़ुदा कैसे दिखे उनको दिलों में जिनके नफ़रत है

मुहब्बत की नज़र देखो ख़ुदा दिखता है जानेमन /2/


ये चंदा और सूरज और जमीनों आसमां सारे

सभी का रूप तेरे रूप से मिलता है जानेमन /3/


ये दुनिया इक बगीचा है बगीचे में ये देखा मैं

सभी फूलों का हर भँवरे से कुछ रिश्ता है जानेमन /4/


अभी मशरूफ हूँ थोड़ा मैं करियर को बनाने में

तुझे पाने की ख़ातिर बस यही रस्ता है जानेमन /5/


कभी खुलकर नहीं कहता तू गज़लों के बहाने सुन

तेरी सादामिज़ाजी पे 'अतुल' मरता है जानेमन /6/


– अतुल मौर्य

06/12/2021


Sunday, July 18, 2021

ग़ज़ल- हम हैं तन्हा तन्हाई में जीते हैं

 

22 - 22 - 22 - 22 - 22 - 2

हम हैं तन्हा तन्हाई में जीते हैं
मोहब्ब्त की सच्चाई में जीते हैं  /१/

आँखें उसकी पैमाने की सूरत हैं
पैमाने की गहराई में जीते हैं  /२/

हम जैसे बंजारे बेघर इंशा हैं जो
वो सब रब की परछाई में जीते हैं /३/

लोगों ने बस घायल करना सीखा है
हम घावों की तुरपाई में जीते हैं /४/

मरते हैं रोजाना खुद में दीवाने
मर मर कर वो हिजराई में जीते हैं /५/

हम हैं थोड़े आवाँरे औ शायर भी
सो गज़लों की गोयाई में जीते हैं /६/

~अतुल मौर्य

Saturday, May 15, 2021

बिन साजन सावन क्या सावन

 

दिन ढलते-ढलते ,ढलते-ढलते थोड़ा-थोड़ा बचा हुआ
रूई-रूई बीच बदरिया बिन्दी भर सूरज छुपा हुआ
पेड़ की कोपल से कोयल की जब-जब कोई कूक उठे
घोर घने मन-उपवन की हर टहनी में एक हूक उठे
छुए  बैरन पुरवईया ले अंगड़ईयां तन खीझ उठे
खेतन में देख मोरन की अठखेलियाँ मन रीझ उठे
बेला ,चम्पा ,गेंदा  पर तितली, भँवरे मंडराते हैं
देख अकेला मेरा जीवन मुझ पे वे मुसकाते हैं
दृश्य सुहावन ये सारे मनभावन तब ही लगते हैं
हिय में बसने वाले पिय पास मेरे जब होते हैं
दीप जलाकर जोहूँ दीपों संग खुद भी जलती हूँ
मन मंदिर में जो चित्र है अंकित उसकी छवि निरखती हूँ
मोती माला की बिखरे ज्यों त्यों मैं रोज बिखरती हूँ
एक आस है कि प्रिय आएंगे यही सोच के रोज सिमटती हूँ
नहि बोल किसी की भावे है नहि अच्छी किसी की चूप लगे
बिन साजन सावन क्या सावन बारिश भी एक धूप लगे

~ अतुल मौर्य
१२/०५/२०२१

Tuesday, April 13, 2021

ग़ज़ल - कमाने वालों की यारों कमाई छूट जाती है

 

1222 - 1222 - 1222 - 1222

कमाने वालों की यारों कमाई छूट जाती है

मुहब्बत सिर चढ़े तो फिर पढ़ाई छूट जाती है


बड़े रिश्ते, मुहब्बत, दोस्ती देखी ज़माने में

ज़रा सी बात पर अब तो कलाई छूट जाती है


इकाई की जगह तुम हो दहाई की जगह दुनिया

इकाई याद रहती है दहाई छूट जाती है


भले ही डीजिटल हम हों गए हों पर गरीबी है

अभी पैसे की किल्लत से दवाई छूट जाती है


मुसलसल काम ही है फार्मूला कामयाबी का

मुसलसल दूध मथने पर मलाई छूट जाती है


– अतुल मौर्य

तारीख: 11 /04/2021

Wednesday, March 17, 2021

कविता- आँसू ऐसे होते हैं

 

कभी कभी ऐसा होता है क्या
कहीं पर बैठे- बैठे
कहीं पर खोए - खोए
गुपचुप से अचानक आता है आँसू ?

नही-नही.. सच तो ये है
कि ये अचानक नहीं होता
उठती रहती हैं लहरें
अचेतन मन-समंदर में
होती रहती है हलचल
जैसे धरती के अंदर
और फिर लहरें हो जातीं हैं ज्वार
और वो हलचल ज्वालामुखी
मन को जैसे ही पातीं हैं कमज़ोर
फूट पड़ती हैं वहीं से

किसी आँख में उमड़ते ज्वार
या बहते लावे को देखना
तो उसे बहने देना तुम
क्योंकि समंदर का ज्वार
और ज्वालामुखी का लावा
ख़ुद से ही होता है शांत
बहते - बहते
बहते - बहते ..।।

~अतुल मौर्य
तारीख : 14 /03/2021

Thursday, March 4, 2021

ग़ज़ल- हज़ारों जख्म खाकर भी यहां पर मुस्कुराना है

 बहरे हज़ज़ मुसम्मन सालिम


1222 - 1222 - 1222 - 1222

हज़ारों ज़ख्म खाकर भी यहां पर मुस्कुराना है

हमें काटों में रहकर भी सदा ख़ुशबू लुटाना है


अलग अंदाज होता है जवानी के दिनों का भी

हवा भी तेज़ है इसमें दिये को भी जलाना है


नज़र आए कहीं यारों तो मुझको इत्तला करना

हथेली खींच कर उसकी मुझे इक दिल बनाना है


कभी बारिश कभी सावन कभी फ़ूलों के गुलशन सा

शुरू में प्यार का मौसम बहुत लगता सुहाना है


नए दिल हैं नई धड़कन नई रुत है नया मंज़र

मुहब्बत भी नई बेशक मगर किस्सा पुराना है


वो बुत जिसको तरासा हमने अपनी ज़िन्दगी देकर

उसे ही याद रखना है उसी को भूल जाना है


अमां सीखो रियाज़ी ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा हमसे

मुहब्बत जोड़ना इसमें  से नफ़रत को घटाना है

  – अतुल मौर्य

  तारीख: 02/03/2021

Thursday, February 11, 2021

ग़ज़ल -तुम मिले तो थी रोशनी कोई

 

बहर-ए- ख़फ़ीफ मुसद्दस मख़बून
फ़ाइलातुन मुफाइलुन फ़ेलुन
2122 / 1212 / 22

तुम मिले तो थी रोशनी कोई
तुम नहीं तो है तीरगी कोई /1/
                                   दोस्त तुमसे थी दोस्ती ऐसी
                                 जैसे आशिक की आशिकी कोई /2/
तुम  मिले  ना अगर हमें होते
हम न कर पाते शायरी कोई /3/
                               दिल मेरा दिल है या है शीशा-घर
                                रोज़ ही चीज़ टूटती कोई /4/
जिस तरह हँस रहा मैं पी कर ग़म
ऐसे जीता है ज़िन्दगी कोई /5/
                                हाँ समझ लो है इश्क तुमको भी
                                 ग़र लगे ख़ुद से क़ीमती कोई /6/
भर गया दिल है दोस्तों से अब
कर लो मुझसे भी दुश्मनी कोई /7/
                                        थोड़ा फैशन में तू 'अतुल' रह ले
                                       अब नहीं चाहे सादगी कोई /8/
         ~अतुल मौर्य
तारीख : 09/02/2021

Monday, January 25, 2021

ग़ज़ल -4 मेरे खामोश लहजे से कहीं ऐसा न हो जाए



बह्र -
1222 - 1222 - 1222 -1222

मेरे खामोश लहजे से कहीं ऐसा न हो जाए
मुझे डर है कि मेरा हम-नवा गुस्सा न हो जाए /१/

जो तुमसे बात ना हो तो बेचारा दिल ये सोचे की
कहीं ऐसा न हो जाए कहीं वैसा न हो जाए /२/

इधर की बात करता है उधर तो जान ले फिर तू
तेरे किरदार का आँचल कहीं मैला न हो जाए /३/

सुना है मिल रही हैं सबसे अब वो झील सी आंखें
तो फिर उस झील का पानी कहीं खारा न हो जाए /४/

न छेड़ो इस  तरह मुझको  कहे कुदरत यही हमसे
जहाँ रहता समंदर है वहाँ सहरा न हो जाए / ५/

'अतुल' रोओ न तुम ऐसे जुदा यारों  की यादों में
तबीअत में कहीं रोने से कुछ घाटा न हो जाए/६/

                                     ~ अतुल मौर्य

Wednesday, January 20, 2021

रात के आँसू

 

मन के बाहर का वातावरण सो रहा
मन के भीतर है जो ,रो रहा-रो रहा
गर्जना मन की मन में ही चलती रही
आँख मलते रहे रात ढलती रही
यादों के जाने कितने किले ढह गए
और मलबे में हम थे दबे रह गए
अश्कों से थी भरी आँख प्यासी रही
और चेहरे पे कोई उदासी रही
चल पड़ा हूँ तुम्हे ढूंढ़ने स्वर्ग तक
मेरी दुनिया तुम्ही से तो है तुम तलक
ये मुझे है ख़बर और तुम्हें भी पता
ना ही मैं हूँ ग़लत ना तेरी कुछ ख़ता
बात हमने किया जब-जब भी कभी
जल उठे सारे किस्मत के पन्ने सभी
राह तक लूंगा मैं उम्र के छोर तक
आखिरी सांस की आखिरी डोर तक
आखिरी सांस की आखिरी डोर तक
रात का ये अंतिम पहर खो रहा
ले के पलकों पे मैं बोझ हूँ ढो रहा
मन के बाहर का बातावरण सो रहा
मन के भीतर है जो , रो रहा-रो रहा
रो रहा ... रो रहा...

~ अतुल मौर्य

    तारीख : 21 जनवरी 2021










Wednesday, November 18, 2020

लघुकविता- स्त्री

 

सहनशीलता , मर्यादा,
लोकलाज ,भावुकता,
स्नेह, करुणा
और न जाने क्या- क्या
सदियों से ढूँढा गया क्यों उनमें ही
इनका होना ही परिभाषा बना स्त्री का
सच है गर ये परिभाषा
तो हर पुरूष को चाहिए
बन जाए वो भी स्त्री
  
~ अतुल मौर्य
रविवार, 8 नवम्बर ,2020

Thursday, October 8, 2020

ग़ज़ल-7 जलें सब वो जब मुस्कुरा कर चले

 


जलें सब, वो जब मुस्कुरा कर चले

कहें, क्यूँ वो नज़रें उठा कर चले  /१/


जो कहते थे बेटी रहे घर में ही

उन्हें बेटी ठेंगा दिखा कर चले /२/


झुका सर तो सर फिर कहाँ सर रहा

चले हम  जहाँ सर उठा कर  चले /३/


सफर में रहे उम्र भर इस कदर

की हम रहगुज़र को चला कर चले/४/


गज़ब थे वे भी सरफिरे लोग जो

वतन के लिए जां फिदा कर चले /५/


ज़माना हमें बस  दग़ा ही दिया

'अतुल' तो है नादाँ वफ़ा कर चले /६/


                         © अतुल मौर्य

              तारीख : 27/09/2020


                          




Monday, September 28, 2020

ग़ज़ल-6 भरो हुंकार ऐसी

 1222-1222-1222-1222


भरो हुंकार ऐसी, दिल्ली का दरबार हिल जाए

युवाओं कर दो कुछ ऐसा  कि ये सरकार हिल जाए /१/


यहाँ जो बाँटते हैं मजहबों के नाम पे हमको

करो इक वार उनकी नफरती दीवार हिल जाए /२/


हुकूमत चीज क्या मिल कर दहाड़ो साथ में तुम तो

बुलंदी से खड़ी वो चीन की दीवार हिल जाए /३/


जवाने हिन्द गर जय हिन्द का जयघोष जो कर दें

तो डर के फौज जो सरहद के है उस पार हिल जाए /४/


                                     ~अतुल मौर्य

                              तारीख- 29/09/2020


                                    

                       




Friday, September 11, 2020

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

 

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

मेरी आँखों में कोई रहता है

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

मेरे अश्कों संग कोई बहता है

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

मेरे दिन में, मेरी रात में

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

मेरी चुप्पी में, मेरी बात में

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

अभी लिखकर जिसे मिटाया है

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

याद कर के जिसे भुलाया है

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

दूर हो के जो पास है

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

वो बहुत बदमाश है

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

वो शायर का दिवान है

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

वो गज़लों का उन्वान है

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

वो कविताओं की भाषा है

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

वो छंदों की परिभाषा है

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

मेरी हर लिखावट में

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

शब्दों की सजावट में

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

काग़ज़ के कोरेपन में उसे

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

अंतस के सूनेपन में उसे

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

वो चाँद तारों में है

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

वो सारे के सारों में है

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

वो पत्तों में है, डाली में है

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

वो खेतों की हरियाली में है

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

चुम्बन करती हवाओं में

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

काली घिरती घटाओं में

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

वो किताबों में है

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

वो शराबों में है

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

कोयल की आवाज़ में

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

परिंदों की परवाज़ में

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

सागर में, दरियाओं में

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

जलते-तपते सहराओं में

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

मोरों के नृत्य प्रदर्शन में

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

ग्रंथो में वर्णित दर्शन में

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

वीणा की हर इक तान में

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

संगीत की मधुमय गान में

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

बच्चों की मुस्कान में

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

मंदिर के कीर्तन गान में

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

मस्जिद से होती अजान में

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

सुबह में, शाम में

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

अपने-अपने काम में

इन सब जगहों पर मैंने

मैंने उसको ढूँढ़ा है

इन सब जगहों पर मैंने

मैंने उसको पाया है

प्रिय पाठक , प्रिय स्रोता तुम भी

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो।।

                                         ~अतुल मौर्य


तारीख- 11/09/2020





Tuesday, September 8, 2020

डायरी

 

खोई हुई डायरी का मिलना
यानी एक जीवन का मिलना
पन्ने को पलटना यानी
जिन्दगी को सफर पर ले जाना
उस वक्त रुक सा गया
कोई पन्ना, मेरी नज़रों में
कोई आवाज़, मेरे ज़हन में
कोई आँसू, मेरे अन्तस में
आखिर क्यों लिखा था उसने
"I always with you"
जबकि जाना ही था  उसे
छोड़कर मुझे ..।
पन्ने तो उम्र जैसे ही सीमित होते हैं
जीवन एक डायरी है
काश की उस डायरी के पन्ने खत्म ही न होते
तो मैं उम्र भर पलटता रहता उसके पन्ने
और जी लेता एक जीवन डायरी के संग
पर ऐसा कहाँ होता है
उम्र सीमित है
और पन्ने भी ।
  
                             ~अतुल  
                          तारीख : 30/08/2020

Sunday, September 6, 2020

ग़ज़ल–5 न जिसके सर पे साया हो वो जाए तो कहाँ जाए

 

1222 - 1222 - 1222 - 1222

न जिसके सर पे साया हो वो जाए तो कहाँ जाए
जो अपने घर का मारा हो वो जाए तो कहाँ जाए/१/

सहारा हो ज़मी का तो कदम चलने को हों राज़ी
नहीं जिसका सहारा हो वो जाए तो कहाँ जाए/२/

दुकानें बंद हो तो भी सभी का काम चलता है
कि जो  मय का दिवाना हो वो जाए तो कहाँ जाए/३/

चले गोली तो मुमकिन है की कोई बच भी जाए पर
जो नज़रों का निशाना हो वो जाए तो कहाँ जाए/४/

लहर चलती है तो आ करके टकराती हैं साहिल से
जो पहले ही किनारा हो वो जाए तो कहाँ जाए/५/

मेरी दीवानगी को देख हैरत में ख़ुदा बोला
'अतुल' सा जो दिवाना हो वो जाए तो कहाँ जाए/६/
 
                                           ~ अतुल मौर्य

Monday, May 25, 2020

जवाब दो मुझे

मैं
परेशां तो पहले भी था
हैरां तो पहले भी था
मजबूर तो पहले भी हुआ था
थक के चूर तो पहले भी हुआ था
पहले भी कई बार
मना किया है भूख को ,की आज मत आना
आमन्त्रित किया है नींद को ,की आज जल्दी आना
बनाये हैं कई बार बहाने
बोलें हैं सौ-सौ झूठ
मगर
इतना परेशां , इतना हैरां
इतना मजबूर , इतना थक के चूर
इतना भूखा, कई रातों का जगा
पहले कभी न था
नहीं आते अब मुझे बनाने बहाने
और न आते हैं वो झूठ भी
आज विवश हूँ सोचने के लिए
आखिर कौन हूँ मैं , क्यों हूँ इतना तंग
मैं वही कि
जिसके दम से सड़कें ,सड़क बनीं हैं
जिसके दम से शहर , शहर बनें हैं
जिसके दम से चलते हैं कल - कारखानें
जिसके दम से  सांस लेती हैं मशीनें
जिसके दम से इठलाती हैं ऊँची इमारतें
जिसके दम से मुस्कुराती हैं सारी दुकानें
क्या सच में यही हूँ मैं
यही हूँ तो क्यों
ये दुकानों , इमारतों , कारखानों और शहरों के मालिक
न पाल सके मेरा पेट
न दे सके सर पे मेरे छत
न दे सके चंद सिक्के
न दे सके उम्मीद
क्या इसीलिए
की प्यासी थीं मेरे खूं की रेल की पटरियां
की भूखी थीं सड़कें मेरे पावों के छालों के लिए
या करनी थी सियासत आकाओं , हुक्मरानों को
या रचनी थी कुछ कविताएं ,
बनाने थे संगीत ,
खिंचवानी थी फ़ोटो मेरी
मुफलिसी के साथ
मेरी बेबसी के साथ
बताओ क्यों , क्यों , क्यों
जवाब दो मुझे , भारत !
जवाब दो मुझे ।
मैं
परेशां तो पहले भी था
हैरां तो पहले भी था ..।।
                                    ~ अतुल मौर्य

Thursday, May 7, 2020

सन्नाटा और मैं

एक सन्नाटा रहता मेरे अंदर है
चीखता चिल्लाता जो निरन्तर है
दिन - दुपहर को रहे ये मौन साधे
बेचैनियां बाँटता फिर रात भर है

ये सन्नाटा कभी खुशहाल कर देता मुझे
और कभी जीवन पथ पे असहाय कर देता मुझे
इस सन्नाटे ने बेशक  बर्बादियाँ दी हैं मुझे
पर मुवावजे में गीतों की पंक्तियाँ दी हैं मुझे
इस सन्नाटे से है गहरा कोई नाता मेरा
इस सन्नाटे में है विष भरा, अमृत भरा
होता इसके साथ ही सोना मेरा, जगना मेरा
उठना मेरा , बैठना मेरा, ओढ़ना - बिछाना मेरा
कभी खामोशी के सागर में मुझे बहाकर ले जाता
कभी उदासी के पर्वत पर मुझे उड़ाकर ले जाता
बरखा बन के कभी ये बौछार मेरी ओर करता
बदरा बन के कभी ये गर्जना घनघोर करता
इस सन्नाटे में ही मैं गीत बुनता हूँ
इस सन्नाटे में ही मैं प्रीत चुनता हूँ
इस सन्नाटे से घंटो संवाद करता हूँ
जाने कितना वक्त मैं बर्बाद करता हूँ
 संवाद बीच अँखिया जब बह जाने को कहती हैं
दो नयननीरों को मिला इलाहाबाद करता हूँ
कुछ आसुंओं को आंखों से जब रिहाई मिल जाती है
दर्द के मारे बुनियाद हमारे दिल की जब हिल जाती है
तब जा करके सन्नाटा आकार लेता है
तब जा करके  हृदय उद्गार करता है
विसंगतियों से तब आँखे चार करता है
मन ही मन में कितना हाहाकार करता है
हाय ! सन्नाटा ये कितना भयंकर है
मुस्कान पार्वती का है तो
कभी क्रोधित शिव - शंकर है
हाँ ! यही सन्नाटा रहता मेरे अंदर है
चीखता - चिल्लाता जो निरन्तर है
  दिन - दुपहर को रहे ये मौन साधे
बेचैनियां बाँटता फिर रात भर है
                                 
                                   ~ अतुल मौर्य
                                    08/05/2020


Tuesday, May 5, 2020

यही वही , वही यही

वही जो कल किया था हमने
वही तो मिल रहा है आज
मगर, मुकाबले नेकियों के
मिल रहा जो बदी का
वो कुछ ज्यादा है
शायद सूद पे सूद समेत
यही वसूल-ए-जिंदगी
जो हम समझ पाते तभी
तो  आज  न होते ये , रतजगे
जो कर रहे हैं हम
और शायद न होती ये
कविता भी
वही बातें है पुरानी कुछ
यही कुछ साल पुरानी
मालूम होता अंजाम-ए-वफ़ा
तो पत्थर न बनते उसके रस्ते का
और शायद जो कह रहा है हमें वो बेवफ़ा
वो भी
हमारे पास अब कुछ नहीं
कुछ भी नहीं सिवा आपबीती के
और कभी खत्म न होने वाला
वो किस्सा भी
इस किस्से को कहते हुए
दबा के गम सीने में
 समेट देता हूं वो किस्सा
कितनी आसानी , कितनी चालाकी से
की मुस्कुरा के कहता हूँ
यही सब है बस..
यही वही , वही यही ...।

                                       ~ अतुल मौर्य
                                       06/05/2020

यही कुछ रात के बारह बजे हैं

 यही कुछ रात के बारह बजे हैं
अकेला हूँ कमरे में
 और भीतर से  भी
दाएं की करवट लेटे
हाथ को तकिया बनाये
वर्तमान और भविष्य को
अतीत में तौल रहा हूँ कि
कोई आँसू सा पलकों पे ठहर जाता है
और बेकल है किनारों से बह जाने को
फिर एक आह लेते
करवट सीधी करते
निगाह छत से टंगे पंखे पे रुकती है
और मन किसी  याद पे
 इतने में बाएं हाथ की अनामिका
सूखे होठ पे रख कर
आँखों में हजारों चेहरा बना और मिटा रहा हूँ
इन्हीं उलझनों ,बेचैनियों की कश्मकश में
जाने कब
मन  और आँख थक गई , मैं सो गया
यही कुछ रात के बारह बजे थे ।
                 
                       ~ अतुल मौर्य
                       03/05/2020

https://youtu.be/mYn1i_qCZuA

ग़ज़ल

ग़ज़ल-6 भरो हुंकार ऐसी

 1222-1222-1222-1222 भरो हुंकार ऐसी, दिल्ली का दरबार हिल जाए युवाओं कर दो कुछ ऐसा  कि ये सरकार हिल जाए /१/ यहाँ जो बाँटते हैं मजहबों के नाम ...