"मैं लिखता हूँ ताकि एहसास जिंदा रहें" (I write so that feelings stay alive). I am Atul, and this blog is my canvas. Through my poetry and ghazals, I try to capture the beauty of the Hindi and Urdu languages and the depth of the human heart. Thank you for being a part of my literary journey.
Monday, January 25, 2021
ग़ज़ल -4 मेरे खामोश लहजे से कहीं ऐसा न हो जाए
Wednesday, January 20, 2021
रात के आँसू
मन के बाहर का वातावरण सो रहा
मन के भीतर है जो ,रो रहा-रो रहा
गर्जना मन की मन में ही चलती रही
आँख मलते रहे रात ढलती रही
यादों के जाने कितने किले ढह गए
और मलबे में हम थे दबे रह गए
अश्कों से थी भरी आँख प्यासी रही
और चेहरे पे कोई उदासी रही
चल पड़ा हूँ तुम्हे ढूंढ़ने स्वर्ग तक
मेरी दुनिया तुम्ही से तो है तुम तलक
ये मुझे है ख़बर और तुम्हें भी पता
ना ही मैं हूँ ग़लत ना तेरी कुछ ख़ता
बात हमने किया जब-जब भी कभी
जल उठे सारे किस्मत के पन्ने सभी
राह तक लूंगा मैं उम्र के छोर तक
आखिरी सांस की आखिरी डोर तक
आखिरी सांस की आखिरी डोर तक
रात का ये अंतिम पहर खो रहा
ले के पलकों पे मैं बोझ हूँ ढो रहा
मन के बाहर का बातावरण सो रहा
मन के भीतर है जो , रो रहा-रो रहा
रो रहा ... रो रहा...
~ अतुल मौर्य
तारीख : 21 जनवरी 2021Wednesday, November 18, 2020
लघुकविता- स्त्री
सहनशीलता , मर्यादा,
लोकलाज ,भावुकता,
स्नेह, करुणा
और न जाने क्या- क्या
सदियों से ढूँढा गया क्यों उनमें ही
इनका होना ही परिभाषा बना स्त्री का
सच है गर ये परिभाषा
तो हर पुरूष को चाहिए
बन जाए वो भी स्त्री
~ अतुल मौर्य
रविवार, 8 नवम्बर ,2020
Thursday, October 8, 2020
ग़ज़ल-7 जलें सब वो जब मुस्कुरा कर चले
जलें सब, वो जब मुस्कुरा कर चले
कहें, क्यूँ वो नज़रें उठा कर चले /१/
जो कहते थे बेटी रहे घर में ही
उन्हें बेटी ठेंगा दिखा कर चले /२/
झुका सर तो सर फिर कहाँ सर रहा
चले हम जहाँ सर उठा कर चले /३/
सफर में रहे उम्र भर इस कदर
की हम रहगुज़र को चला कर चले/४/
गज़ब थे वे भी सरफिरे लोग जो
वतन के लिए जां फिदा कर चले /५/
ज़माना हमें बस दग़ा ही दिया
'अतुल' तो है नादाँ वफ़ा कर चले /६/
© अतुल मौर्य
तारीख : 27/09/2020
Monday, September 28, 2020
ग़ज़ल-6 भरो हुंकार ऐसी
1222-1222-1222-1222
भरो हुंकार ऐसी, दिल्ली का दरबार हिल जाए
युवाओं कर दो कुछ ऐसा कि ये सरकार हिल जाए /१/
यहाँ जो बाँटते हैं मजहबों के नाम पे हमको
करो इक वार उनकी नफरती दीवार हिल जाए /२/
हुकूमत चीज क्या मिल कर दहाड़ो साथ में तुम तो
बुलंदी से खड़ी वो चीन की दीवार हिल जाए /३/
जवाने हिन्द गर जय हिन्द का जयघोष जो कर दें
तो डर के फौज जो सरहद के है उस पार हिल जाए /४/
~अतुल मौर्य
तारीख- 29/09/2020
Friday, September 11, 2020
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
मेरी आँखों में कोई रहता है
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
मेरे अश्कों संग कोई बहता है
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
मेरे दिन में, मेरी रात में
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
मेरी चुप्पी में, मेरी बात में
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
अभी लिखकर जिसे मिटाया है
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
याद कर के जिसे भुलाया है
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
दूर हो के जो पास है
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
वो बहुत बदमाश है
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
वो शायर का दिवान है
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
वो गज़लों का उन्वान है
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
वो कविताओं की भाषा है
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
वो छंदों की परिभाषा है
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
मेरी हर लिखावट में
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
शब्दों की सजावट में
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
काग़ज़ के कोरेपन में उसे
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
अंतस के सूनेपन में उसे
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
वो चाँद तारों में है
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
वो सारे के सारों में है
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
वो पत्तों में है, डाली में है
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
वो खेतों की हरियाली में है
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
चुम्बन करती हवाओं में
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
काली घिरती घटाओं में
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
वो किताबों में है
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
वो शराबों में है
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
कोयल की आवाज़ में
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
परिंदों की परवाज़ में
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
सागर में, दरियाओं में
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
जलते-तपते सहराओं में
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
मोरों के नृत्य प्रदर्शन में
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
ग्रंथो में वर्णित दर्शन में
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
वीणा की हर इक तान में
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
संगीत की मधुमय गान में
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
बच्चों की मुस्कान में
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
मंदिर के कीर्तन गान में
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
मस्जिद से होती अजान में
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
सुबह में, शाम में
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
अपने-अपने काम में
इन सब जगहों पर मैंने
मैंने उसको ढूँढ़ा है
इन सब जगहों पर मैंने
मैंने उसको पाया है
प्रिय पाठक , प्रिय स्रोता तुम भी
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो
ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ लो।।
~अतुल मौर्य
तारीख- 11/09/2020
Tuesday, September 8, 2020
डायरी
खोई हुई डायरी का मिलना
यानी एक जीवन का मिलना
पन्ने को पलटना यानी
जिन्दगी को सफर पर ले जाना
उस वक्त रुक सा गया
कोई पन्ना, मेरी नज़रों में
कोई आवाज़, मेरे ज़हन में
कोई आँसू, मेरे अन्तस में
आखिर क्यों लिखा था उसने
"I always with you"
जबकि जाना ही था उसे
छोड़कर मुझे ..।
पन्ने तो उम्र जैसे ही सीमित होते हैं
जीवन एक डायरी है
काश की उस डायरी के पन्ने खत्म ही न होते
तो मैं उम्र भर पलटता रहता उसके पन्ने
और जी लेता एक जीवन डायरी के संग
पर ऐसा कहाँ होता है
उम्र सीमित है
और पन्ने भी ।
~अतुल
तारीख : 30/08/2020
Sunday, September 6, 2020
ग़ज़ल–5 न जिसके सर पे साया हो वो जाए तो कहाँ जाए
1222 - 1222 - 1222 - 1222
न जिसके सर पे साया हो वो जाए तो कहाँ जाए
जो अपने घर का मारा हो वो जाए तो कहाँ जाए/१/
सहारा हो ज़मी का तो कदम चलने को हों राज़ी
नहीं जिसका सहारा हो वो जाए तो कहाँ जाए/२/
दुकानें बंद हो तो भी सभी का काम चलता है
कि जो मय का दिवाना हो वो जाए तो कहाँ जाए/३/
चले गोली तो मुमकिन है की कोई बच भी जाए पर
जो नज़रों का निशाना हो वो जाए तो कहाँ जाए/४/
लहर चलती है तो आ करके टकराती हैं साहिल से
जो पहले ही किनारा हो वो जाए तो कहाँ जाए/५/
मेरी दीवानगी को देख हैरत में ख़ुदा बोला
'अतुल' सा जो दिवाना हो वो जाए तो कहाँ जाए/६/
~ अतुल मौर्य
Monday, May 25, 2020
जवाब दो मुझे
परेशां तो पहले भी था
हैरां तो पहले भी था
मजबूर तो पहले भी हुआ था
थक के चूर तो पहले भी हुआ था
पहले भी कई बार
मना किया है भूख को ,की आज मत आना
आमन्त्रित किया है नींद को ,की आज जल्दी आना
बनाये हैं कई बार बहाने
बोलें हैं सौ-सौ झूठ
मगर
इतना परेशां , इतना हैरां
इतना मजबूर , इतना थक के चूर
इतना भूखा, कई रातों का जगा
पहले कभी न था
नहीं आते अब मुझे बनाने बहाने
और न आते हैं वो झूठ भी
आज विवश हूँ सोचने के लिए
आखिर कौन हूँ मैं , क्यों हूँ इतना तंग
मैं वही कि
जिसके दम से सड़कें ,सड़क बनीं हैं
जिसके दम से शहर , शहर बनें हैं
जिसके दम से चलते हैं कल - कारखानें
जिसके दम से सांस लेती हैं मशीनें
जिसके दम से इठलाती हैं ऊँची इमारतें
जिसके दम से मुस्कुराती हैं सारी दुकानें
क्या सच में यही हूँ मैं
यही हूँ तो क्यों
ये दुकानों , इमारतों , कारखानों और शहरों के मालिक
न पाल सके मेरा पेट
न दे सके सर पे मेरे छत
न दे सके चंद सिक्के
न दे सके उम्मीद
क्या इसीलिए
की प्यासी थीं मेरे खूं की रेल की पटरियां
की भूखी थीं सड़कें मेरे पावों के छालों के लिए
या करनी थी सियासत आकाओं , हुक्मरानों को
या रचनी थी कुछ कविताएं ,
बनाने थे संगीत ,
खिंचवानी थी फ़ोटो मेरी
मुफलिसी के साथ
मेरी बेबसी के साथ
बताओ क्यों , क्यों , क्यों
जवाब दो मुझे , भारत !
जवाब दो मुझे ।
मैं
परेशां तो पहले भी था
हैरां तो पहले भी था ..।।
~ अतुल मौर्य
Thursday, May 7, 2020
सन्नाटा और मैं
चीखता चिल्लाता जो निरन्तर है
दिन - दुपहर को रहे ये मौन साधे
बेचैनियां बाँटता फिर रात भर है
ये सन्नाटा कभी खुशहाल कर देता मुझे
और कभी जीवन पथ पे असहाय कर देता मुझे
इस सन्नाटे ने बेशक बर्बादियाँ दी हैं मुझे
पर मुवावजे में गीतों की पंक्तियाँ दी हैं मुझे
इस सन्नाटे से है गहरा कोई नाता मेरा
इस सन्नाटे में है विष भरा, अमृत भरा
होता इसके साथ ही सोना मेरा, जगना मेरा
उठना मेरा , बैठना मेरा, ओढ़ना - बिछाना मेरा
कभी खामोशी के सागर में मुझे बहाकर ले जाता
कभी उदासी के पर्वत पर मुझे उड़ाकर ले जाता
बरखा बन के कभी ये बौछार मेरी ओर करता
बदरा बन के कभी ये गर्जना घनघोर करता
इस सन्नाटे में ही मैं गीत बुनता हूँ
इस सन्नाटे में ही मैं प्रीत चुनता हूँ
इस सन्नाटे से घंटो संवाद करता हूँ
जाने कितना वक्त मैं बर्बाद करता हूँ
संवाद बीच अँखिया जब बह जाने को कहती हैं
दो नयननीरों को मिला इलाहाबाद करता हूँ
कुछ आसुंओं को आंखों से जब रिहाई मिल जाती है
दर्द के मारे बुनियाद हमारे दिल की जब हिल जाती है
तब जा करके सन्नाटा आकार लेता है
तब जा करके हृदय उद्गार करता है
विसंगतियों से तब आँखे चार करता है
मन ही मन में कितना हाहाकार करता है
हाय ! सन्नाटा ये कितना भयंकर है
मुस्कान पार्वती का है तो
कभी क्रोधित शिव - शंकर है
हाँ ! यही सन्नाटा रहता मेरे अंदर है
चीखता - चिल्लाता जो निरन्तर है
दिन - दुपहर को रहे ये मौन साधे
बेचैनियां बाँटता फिर रात भर है
~ अतुल मौर्य
08/05/2020
Tuesday, May 5, 2020
यही वही , वही यही
वही तो मिल रहा है आज
मगर, मुकाबले नेकियों के
मिल रहा जो बदी का
वो कुछ ज्यादा है
शायद सूद पे सूद समेत
यही वसूल-ए-जिंदगी
जो हम समझ पाते तभी
तो आज न होते ये , रतजगे
जो कर रहे हैं हम
और शायद न होती ये
कविता भी
वही बातें है पुरानी कुछ
यही कुछ साल पुरानी
मालूम होता अंजाम-ए-वफ़ा
तो पत्थर न बनते उसके रस्ते का
और शायद जो कह रहा है हमें वो बेवफ़ा
वो भी
हमारे पास अब कुछ नहीं
कुछ भी नहीं सिवा आपबीती के
और कभी खत्म न होने वाला
वो किस्सा भी
इस किस्से को कहते हुए
दबा के गम सीने में
समेट देता हूं वो किस्सा
कितनी आसानी , कितनी चालाकी से
की मुस्कुरा के कहता हूँ
यही सब है बस..
यही वही , वही यही ...।
~ अतुल मौर्य
06/05/2020
यही कुछ रात के बारह बजे हैं
अकेला हूँ कमरे में
और भीतर से भी
दाएं की करवट लेटे
हाथ को तकिया बनाये
वर्तमान और भविष्य को
अतीत में तौल रहा हूँ कि
कोई आँसू सा पलकों पे ठहर जाता है
और बेकल है किनारों से बह जाने को
फिर एक आह लेते
करवट सीधी करते
निगाह छत से टंगे पंखे पे रुकती है
और मन किसी याद पे
इतने में बाएं हाथ की अनामिका
सूखे होठ पे रख कर
आँखों में हजारों चेहरा बना और मिटा रहा हूँ
इन्हीं उलझनों ,बेचैनियों की कश्मकश में
जाने कब
मन और आँख थक गई , मैं सो गया
यही कुछ रात के बारह बजे थे ।
~ अतुल मौर्य
03/05/2020
Tuesday, April 28, 2020
ग़ज़ल - 3 गुजारी ज़िंदगी हमने तो पीने में पिलाने में
अतुल' तुमको भला कैसे भुला सकता है अब कोई
जो रहते हो लबों पे और हर दिल के ठिकाने में //१०
Tuesday, April 14, 2020
ग़ज़ल -2 देखते ही हम नशे में खो गए
हम हवाले आप के अब हो गए //१
आप में हम इस तरह से खो गए//२
चाँद तारे आसमाँ में खो गए //३
पोंछ कर आंसू सिसक के सो गए //४
हैं अतुल वो आज भी जो इश्क में
लैला- मजनू , हीर - रांझे हो गए //५
~ अतुल मौर्य
14 / 04 / 2020
Tuesday, April 7, 2020
कविता लिखूँ कोई तुम पे
लिखूँ अगर कुछ भी तो बस इतनी सी चीज लिखूँ
प्रीत भरी स्याही में डुबो कर अपनी लेखनी
अंतर्मन के पन्नों पर तुमको अपना मीत लिखूँ
खोए - खोए मन को तुम ऐसे बहला देती हो
मस्तानी पवन जैसे उपवन में फूलों को सहला देती हो
हे मेरे सच्चे साथी सुनो मैं जीत चुका हूँ सबकुछ
और हार के तुम पे नाम तुम्हारे अपनी सारी जीत लिखूँ
अंतर्मन के पन्नों पर ....
जीवन पथ पर मिले हो तो जीवन पथ तक संग रहना
घोर तिमिर छाए जब - जब तारों से चमकते रहना
आनंद- व्यथा कुछ और नहीं ये वाद्ययंत्र हैं जीवन के
इन यंत्रो के लिए मैं तुम सा कोई मधुमय गीत लिखूँ
अंतर्मन के पन्नों पर.....
लिखूँ तो बस लिखता ही रहूँ न थकूं कभी लिखते- लिखते
हे प्यारे बंधु , शखा मेरे तुम्हें मीत, मीत, और मीत लिखूँ
~ अतुल मौर्य
ग़ज़ल -1 जी भर के तुम्हें देखना चाहता हूं
बह्र-
122 - 122 - 122 - 122
जी भर के तुझे देखना चाहता हूँ
तेरी आँख में डूबना चाहता हूँ /1/
ग़ज़ल बन के आओ वरक पे ज़रा तुम
नज़र से तुम्हे चूमना चाहता हूँ /2/
न हो गमजदा हमनशीं मेरे हमदम
तुम्हे खुशनुमा देखना चाहता हूं /3/
न मतलब मुझे काम से है तुम्हारे
है क्या नाम ये जानना चाहता हूँ /4/
तुम्हें जिंदगानी में कर के मैं शामिल
तुम्हें जिंदगी सौंपना चाहता हूं /5/
~ अतुल मौर्य
Wednesday, January 29, 2020
मैं कल रात बहुत अकेला था
अचानक घर की याद आयी थी मुझे
अपने को , अपनों से दूर पा रहा था
घड़ी की टिक-टिक कानों पर भारी पड़ रही थी
सिसक और बेचैनी एक साथ बढ़ रही थी
मन के भीतर एक हिस्से में सन्नाटा तो एक हिस्से में शोर था
मैं बहुत भाव विभोर था
कम्बल फेंक कर बिस्तर पे बैठ जाता
तो कभी ओढ़ कर लेट जाता
मेरे साथ अतीत की यादों का मेला था
मैं कल रात बहुत अकेला था
मैं कल रात बहुत अकेला था ।
- अतुल मौर्य
Friday, January 24, 2020
हर रोज सुबह होती है
Thursday, January 23, 2020
मुझ जैसा ही रहने दो मुझे
ग़ज़ल
ग़ज़ल-6 भरो हुंकार ऐसी
1222-1222-1222-1222 भरो हुंकार ऐसी, दिल्ली का दरबार हिल जाए युवाओं कर दो कुछ ऐसा कि ये सरकार हिल जाए /१/ यहाँ जो बाँटते हैं मजहबों के नाम ...
-
22-22-22-22-22-22-2 मेरी आँखों में समन्दर के सिवा कुछ भी नहीं है और उसको देख के लगता है हुआ कुछ भी नहीं है चाराग़र देख के कहते हैं मुझ...
-
1222-1222-1222-1222 भरो हुंकार ऐसी, दिल्ली का दरबार हिल जाए युवाओं कर दो कुछ ऐसा कि ये सरकार हिल जाए /१/ यहाँ जो बाँटते हैं मजहबों के नाम ...
-
बहरे हज़ज़ मुसम्मन सालिम 1222 - 1222 - 1222 - 1222 हज़ारों ज़ख्म खाकर भी यहां पर मुस्कुराना है हमें काटों में रहकर भी सदा ख़ुशबू लुटाना है अलग...